नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर कर रख दिया है। भोटेकोशी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ ने कुछ ही घंटों में घरों, सड़कों, पुलों और जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया। हजारों परिवार उजड़ गए और बड़ी संख्या में लोग अब भी लापता हैं। 7 सितंबर को नेपाल ने मृतकों की स्मृति में राष्ट्रीय शोक दिवस मनाया। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मृतकों की संख्या 1,355 तक पहुंच चुकी है और लगभग 5,000 लोग अब भी लापता हैं।
यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि बदलती जलवायु और कमजोर आपदा-प्रबंधन व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी भी है। हिमनदों के तेजी से पिघलने, ग्लेशियल झीलों के बढ़ते खतरे और अचानक आने वाली बाढ़ का प्रभाव हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में नेपाल अकेला प्रभावित देश नहीं है। हिमालय से निकलने वाली नदियां भारत सहित पूरे क्षेत्र के करोड़ों लोगों के जीवन से जुड़ी हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति उन सैकड़ों लोगों की है जो जलविद्युत परियोजनाओं की सुरंगों में फंसे होने की आशंका है। राहत और बचाव कार्य जारी हैं, लेकिन ऐसी परिस्थितियां बताती हैं कि आपदा आने से पहले चेतावनी, सुरक्षित निकासी और त्वरित संचार की व्यवस्था कितनी महत्वपूर्ण है।
भारत को इस त्रासदी में नेपाल के साथ मजबूती से खड़ा रहना चाहिए। मानवीय सहायता के साथ-साथ दोनों देशों को हिमालयी आपदाओं के लिए साझा पूर्व चेतावनी प्रणाली, मौसम और जल प्रवाह संबंधी आंकड़ों के आदान-प्रदान तथा संयुक्त बचाव तंत्र विकसित करना चाहिए।
नेपाल की यह त्रासदी हमें याद दिलाती है कि प्रकृति सीमाओं को नहीं पहचानती। इसलिए आपदा से मुकाबला भी सीमाओं से ऊपर उठकर, सहयोग और मानवीय संवेदना के साथ ही संभव है।
